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रोहतासगढ़ किला का इतिहास – Rohtas Garh Fort History – जाने रोचक तथ्य

रोहतासगढ़ किला भारत केपुराने किलों में से एक है यह किला बिहार के रोहतास जिला मे स्थित है, इस किला के बारे में काफी कम चर्चा होती है, यदि आप रोहतास के लोगों से ही पूछे तो काफी कम लोगों को पता है जब की इस किले का इतिहास काफी सुनहरा रहा है, इससे बहुत सारे इतिहास जुड़े है जो काफी बड़ा किला है. बिहार के रोहतास जिले के सोन नदी बहाव की ओर काफी ऊंचा पहाण पर स्थित है जो देहरी आनसोन से 43 किलोमीटर और सासाराम से करीब 55 किलोमीटर दूरी पर है समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 1500 मीटर है,


रोहतासगढ़ किला का निर्माण काल – Rohtas Garh Fort


इस किले के निर्माण काल के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है रोहतासगढ़ किला का निर्माण त्रेता युग में हुआ था जिसे सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था. रोहिताश्व की जन्म भूमि अयोध्या है.


Rohtas Garh Fort को धोखे से किया गया कब्जा


यह किला ज्यादा समय तक हिन्दू संरक्षण में रहा है, लेकिन जैसे-जैसे देश में मुस्लिम आक्रान्ताओ की तादात बढ़ी जिसके बाद सन 1539 में किला मुस्लिमों का गुलाम हो गया, क्योंकी 1539 से पहले इस किले के राजा नृपती थे लेकिन जब शेरशाह और हूँमायूँ में युद्ध हुआ तो शेरशाह डर के मारें मुसीबत का बहाना बना के सूर्यवंशी राजा नृपती से शरण के लिए आग्रह किया की मैं बहुत काफी मुसीबत में हूँ मेरे मित्र मुझे कुछ दिनों के लिए अपने किले में रहने के लिए अनुमति दें, वैसे राजा नृपती पहलें से जानते थे की शेरशाह धोखा दे सकता है लेकिन फिर भी नम्र बिनती को स्वीकार करते हुए केवल महिलाएं को रहने के लिए अनुमति दी, उसके बाद शेरशाह के यहाँ से महिलयों को लाने के लिए सौ डोलियाँ चल दी लेकिन उन डोलियों में सबसे पीछे वाली डोली में शेरशाह बैठा था और आगे वाली डोली में कुछ बूढ़ी औरतें बैठी थी और बाकी डोलियों में शेरशाह और उसके सिपाही बैठे थे.


पहले किसी भी डोली की जांच नहीं हुई लेकिन जैसे ही डोली किला के पास पहुंची तो राजा नृपती के आदेश अनुसार प्रत्येक डोली की जांच होने का आदेश दिया गया, पहले आगे की डोलियों की जांच चालू हुआ जिसमें केवल कुछ बुड़ी औरतें निकली है, इस बात की खबर डोली में छिपे शेरशाह और उनके सैनिकों को पता चला की डोली की जांच हो रही है वे सब तुरंत डोली से बाहर निकाल कर सबसे पहले पहरेदार को मारा और रोहतासगढ़ किला पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया.


वैसे इस किले को ज़्यादा महत्व तब मिला जब शेरशाह ने सन 1539 में हिन्दू राजा से धोंखे से कब्जा कर शासन किया, शेरशाह ने इस किले के पहरेदारी में 10000 सैनिक तैनात किए गए थे। उसके बाद इस किले को ज़्यादा महत्व मिला.


जैसा की हर मुस्लिमो की एक आदत होती है हिन्दू धार्मिक या ऐतिहासिक जगह पर मस्जिद बनाने की जिसका पालन करते हुये शेर शाह सूरी के शासन काल में उसके एक सैनिक हैबत खान ने रोहतसगढ़ किले के परिसर में जामा मस्जिद का निर्माण भी करवाया था. ताकि वहाँ की हिन्दू धार्मिक या ऐतिहासिक मान्यतानों को नस्ट कर मुस्लिम ने किले को बनवाया ये सिद्ध किजा जा सके जैसा की भारत में 40,000 हिन्दू धार्मिक या ऐतिहासिक जगहो पर किया गया है. जिनकी लिखित आकडा है. की कैसे मुस्लिम आक्रांताओ ने हिन्दू के धार्मिक या ऐतिहासिक जगह के नाम चंगे कर दिया या उसे तोड़ कर मस्जिद में तब्दील कर दिये.


अकबर के सासन काल में किले के हिन्दू धार्मिक या ऐतिहासिक मान्यतानों को किया गया था नास्ट करने की कोसिस


सन 1588 में ये किला अकबर के नियंत्रण में था जिसके आदेश पर उस किले में ‘तख्ते बादशाही’ नाम का महल बनवाया था और महल के बाहर के परिसर में हब्श खान का मकबरा और सूफी सुलतान का मकबरा और जामी मस्जिद भी बनाया गया है.


किले का बक्सर की लड़ाई से भी सम्बंध है?


बक्सर की लड़ाई से तो आप परिचित होंगे जो 22अक्टूबर 1764 में बक्सर में लड़ा गया था, जिसमे ईस्ट इंडिया कंपनी के हैक्टर मुनरो और मुगल सेनाओं के बीच लड़ा गया था जिसमें बक्सार की लड़ाई के बाद अंग्रेजो ने रोहतास गढ़ किले पर कब्ज़ा जमा लिया था अंग्रेजो काफी समय तक उस किले पर राज किए उस दौरान अंग्रेज़ो ने किले को काफी छती पहुंचाई.


Rohtas Garh Fort के चारदीवार पर इतिहासकारों का मत


इतिहासकारों का मत के अनुसार शेरशाह ने बाद में किला और अपने रक्षा के लिए चारदीवार बनवाया ताकि कोई राजा डायरेक्ट किले पर आक्रमण नहीं कर सकेगा क्योंकी शेरशाह को पता था की जैसे मैंने आसानी से किले पर आक्रम कर कब्जा कर लिया, अगर चरदीवारी नहीं बनी तो कोई भी इस किले पर आक्रम कर कब्जा कर लेगा, ऐसा इतिहासकार मानते है चारदीवारी को ले कर.


सन 1857 में काफी चर्चा में आया रोहतासगढ़ किला – अमर सिंह ने किया अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संचालन


रोहतास गढ़ किला के बारे में बताया जाता है की स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई – 1857 के समय रोहतास से अमर सिंह ने यहीं से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संचालन किया था जिसमे काफी लोग भाग लिए थे, जिसके बाद इस किले की काफी चर्चा बढ़ गई, बाद में अंग्रेजों को भी इस किले से लगाव हो गया, वे भी कई बार इस किले की दौरा कीये जिसके बाद इसकी चर्चा बढ़ती गई.


रोहतासगढ़ किले की सुन्दरता और भव्यात


रोहतासगढ़ किला काफी सुन्दरता और भव्यात है जो देखने लायक है आप जरूर एक बार किला देखने जाएं. यह किला बहुत सारे इतिहास को बाय करता है, इस किले को सबसे पुरने किले में से एक होने की भी मान्यता प्राप्त है.


  • किले का घेरा:- किले का घेरा काफी बड़ा है जो 45 किमी तक फैला हुआ है, पूरा किला घूमने में आप को कम से कम 2 दिन लगेगा.
  • किले का क्षेत्र:- Rohtas Garh Fort 35 कीलों मीटर में फैला हुआ है जिससे इसके सुन्दरता और बढ़ जाती है.
  • किले के दरवाजे:- Rohtas Garh Fort में कुल 83 दरवाजे हैं जिसे देख इसकी सुन्दरता और अच्छा लगता है.
  • किले के घाट:- वैसे तो किले क्षेत्र में बहुत से घाट है लेकिन इनमें से चार- घाटमहत्वपूर्ण हैं जो इस प्रकार है, मेढ़ा घाट, राज घाट, कठौतीया घाट और घोड़ा घाट हैं.
  • किले का रंगमहल:- हर राज महल में एक रंगमहल होता है जिसे ध्यान में रख कर Rohtas Garh Fort में भी सुंदर रंगमहल बना है जिसे आप को एक बार जरूर देखना चाहिए.
  • आईनामहल:- जैसा आप को नाम से ही पता चलता है की ये महल औरतों के सिंगर के लिए बनाया गया था.
  • खूंटा महल:- खूंटा महल में राजा अपने मुकुट, वस्त्र आदि खूंटी पर टाँगने का काम करते थे जिसे खूंटी महल के नाम से जाना जाता है जिसे आप रोहतासगढ़ किले में देख सकते है.
  • शीशमहल:- आप ने शीश महल आमेर किला जयपुर में भी देखा होगा लेकिन उससे काफी पुरानी किला रोहतासगढ़ में ये पहले से ही बना हुआ है, अगर आप मेरी माने तो भारत में जीतने किले बने है उनमे से ज्यादा किले पर रोहतासगढ़ किले की छाप दिखाई देती है.
  • पंचमहल रानीका झरोखा:- झरोखा मतलब जहां बहुत से इमारते होती थी जहां आज भी लोग घूमने जाते है.
  • हथिया पोल – Hathiya Pol:- रोहतासगढ़ किले के मुख्य द्वार को ही हथिया पोल कहा जाता है जिसे हथिया द्वार के नाम से भी जाना जाता है, क्योकि इस द्वार पर हाथी की बहुत सारी प्रतिमा है इस प्रतिमा के चलते द्वार सुन्दर देखते ही बनता है.
  • गणेश मंदिर – Ganesh Temple:- रोहतासगढ़ के क्षेत्र में ही मान सिंह महल है जिसके पश्चिम दिशा की ओर कुछ दुरी पर श्री गणेश भगवान की मंदिर है, ये काफी सुंदर मंदिर है आप जब भी जाएँ भगवान गणेश की दर्शन जरूर करें.
  • रोहतासन मंदिर – Rohtasan Temple:- जो की भगवान शिव का एक भव्य मंदिर है, जिसे रोहतासन मंदिर के नाम से जानते है, ये मंदिर महल से एक मिल की दुरी पर उत्तर पूर्वी दिशा में है जो टूटी-फूटी हालत में बिखरी हुयी है, इस मंदिर तक जाने के लिए बहुत सारी सीढ़िया थी जो अब टूटी –फूटी हालत में है अब केवल 84 सीढिया ही बची है बाकी सब टूट गयी है, आप इन सीढ़िया के सहारे मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्सन कर सकते है.

जिले का नाम रोहतास क्यो पड़ा – रोहतास जिले का किला से क्या सम्बंध है?


रोहतासगढ़ किला का निर्माण राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था. रोहिताश्व ने किले का नाम रोहतासगढ़ रखा जिसके चलते उस क्षेत्र का नाम रोहतास पड़ा, बाद में भारत सरकार ने 10 नवम्बर 1972 में रोहतासगढ़ क्षेत्र को अलग जिला घोसीत कर उसके संस्कृति धरोहर के नाम पर रोहतास जिला बाना कर, उसका नाम रोहतास जिला रखा.


किले की जर्जर अवस्था


आज किला जर्जर बनता जा रहा है, यहाँ पर लिखे ऐतिहासिक तथ्य और बोर्ड काफी पुराना हो गए है जिसके चलते जर्जर हो गई है, पुरातत्व विभाग के लापरवाही के चलते संरक्षण की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गयी जिसके बाद राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष संजय साहनी नें तुरंत केंद्रीय पर्यटन मंत्री को पत्र लिखा ताकि रोहतासगढ़ किले को संरक्षण एवं प्रयटन स्थल के रूप में विकाशित किया जा सके और इस किले की भव्यता को बचाई जा सके.


आजादी से आज तक किसी नेता ने इस किले के लिए कुछ नहीं किया पहली बार किसी पार्टी के अध्यक्ष ने डाइरैक्ट केंद्रीय पर्यटन मंत्री को पत्र लिखा और जल्द से जल्द किले की संरक्षण की मांग की.


रोहतासगढ़ किला जाने का रास्ता


रोहतासगढ़ किला पर पहुँचने के बहुत से रास्ते है, आप चाहें तो internet का भी सहारा ले सकते है, ये किला बिहार के रोहतास जिले में पड़ता है, यदि आप पटना से आना चाहते है तो ट्रेन, बस या अपने पर्सनल गाड़ी से भी आ सकते है, आप को लगभग 4-5 घण्टे का समय लगेगा, पहले आप को सासाराम आना पड़ेगा, जो रोहतास में पड़ता है उसके बाद आप को 30 मिनट का समय लगेगा रोहतसगढ़ किले तक पाहुचने में.


वाराणसी से रोहतसगढ़ किला लगभग 100 किलोमीटर पड़ेगा, आप ट्रेन बस या अपने पर्सनल गाड़ी से भी जा सकते है, वाराणसी से भी पहले आप को सासाराम आना पड़ेगा उसके बाद ही आप रोहतास किला तक पहुँच सकते है.


सासाराम काफी अच्छा बाजार है, सासाराम रेल्वे जंक्शन भी है, वहाँ बहुत से ट्रेन रुकती है आप आईआरसीटीसी (IRCTC) पर चेक कर सकते की सासाराम कौन सी ट्रेन जाती है, आप को सासाराम से आसानी से रोहतसगढ़ के लिए गाड़ी मिल जाएंगी.

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