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सृष्टि के आरंभ में मनुष्य उत्पत्ति।

अष्टम समुल्लास में महर्षि दयानन्द जी लिखते है की सृष्टि के आदि में युवावस्था के रूप में

सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य युवावस्था में उत्पत्ति हुए व यह अमैथुनी उत्पत्ति थी । यह सत्यार्थ प्रकाश में स्पष्ट लिखा है । किन्तु इससे अधिक विवरण वहाँ भी नहीं है व अन्य शास्त्रों में भी पढ़ने में नहीं आया । अनेक विद्वान प्रवचन – लेखादि द्वारा इस प्रक्रिया का संभावित स्वरुप अपनी  ऊहा से प्रकट करते रहे है । ऐसी संभावना जो सृष्टि के अन्य नियमों अधिकाधिक अनुकूल हो व काम से काम प्रतिकूल हो । ऐसी ऊहा – संभावना में संशोधन की संभावना मानते हुए कथन होता है । कोई निश्चित अंतिम तथ्य के रूप में नहीं ।

एकाएक सैकड़ो – सहस्त्रों मनुष्यों के आनें की संभावना आकाश से तो क्षीण प्रायः है । हाँ, धरती में से आने की संभावना  प्रबल है । जिस प्रकार मैथुनी सृष्टि में शिशु माँ के गर्भ में सुरक्षित – पोषित होता है इसी प्रकार धरती के गर्भ में यदि व्यवस्था हो तो युवावस्था ( स्वयं समर्थ होने ) तक वहाँ रहने की बात स्वकारी जा सकती है ।

जिस प्रकार अनेक किट अपने अंडों को मिट्टी के घर में छोड़ देती है , साथ ही उसमें खाद्य सामग्री भी भर देते है , जिससे अंडे से निकला बच्चा मिट्टी के बंद घर में ही भोजन ले कर बड़ा होता रहता है , जब तक की बहार उड़ने योग्य नहीं हो जाता । इसी प्रकार धरती के गर्भ में मानव पोषण पाता रहा हो व समर्थ होने पर धरती के गर्भ से बाहर निकल आया हो ।

आगे जिज्ञासा होगी कि धरती के गर्भ से आरम्भिक कोशिका या भूर्ण कैसे आया होगा ?  गर्भ से भोजन व्यवस्था  कैसे कि गयी होगी ? इसकी कोई प्रक्रिया तो ज्ञात नहीं होती किन्तु यह सब करना सर्वशक्तिमान ईस्वर के लिए संभव है । ईस्वर ने ही सारी व्यवस्था कि होगी । समस्त कोशिकाएं विभिन्न परमाणुओं – अणुओं के संयोग -विशेष से ही बनती है , यह कार्य सर्वज्ञ-सर्वशक्तिमान ईस्वर ना कर सके ऐसी संका ही नहीं कि जा सकती ।  आज मैथुनी सृष्टि में भी गर्भ कि उत्पत्ति , पोषण व बढ़ने कि प्रक्रिया में मानव का आंशिक ही योगदान है । गर्भ के अंदर कैसे जटिल प्रक्रिया चलती है , एक कोशिका से भिन्न भिन्न प्रकार कि कोशिकाएँ बनकर जटिलतम यंत्र शरीर बन जाता है , यह ईस्वर के अतरिक्त कौन कर सकता है ? अमैथुनी सृष्टि में भी यह सब ईस्वर द्वारा हो सकता है यह स्वरिकार करना सरल है । मैथुनी सृष्टि में मात्रा गर्भाधान  व पोषण कि उपलब्धता  ही मनुष्य करता है, वह अमैथुनी  में कैसे होती होगी यह जिज्ञासा  रहती है ।  जब शेष सारी अधिक व जटिल प्रक्रिया ईस्वर कर लेता है तो इसे करने का सामर्थ्य भी ईस्वर में स्वीकार किया जा सकता है । यह अलग बात है कि हम उस प्रक्रिया को जान नहीं पा रहें है ।



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