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चीनी मीडिया ने भारतीय एनएसए डोभाल को बताया डोकलाम में टकराव का ‘मुख्य साजिशकर्ता’

डोकलाम विवाद का हल निकलने की उम्मीदों और अजीत डोभाल के चीन दौरे से ऐन पहले पड़ोसी मुल्क की मीडिया ने भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को निशाने पर लिया है। चीन सरकार के मुखपत्र माने जाने वाले अखबार ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय लेख में डोभाल को डोकलाम में तनाव का \’मुख्य साजिशकर्ता\’ करार दिया है। इस लेख में ब्रिक्स की मीटिंग में भारतीय और चीनी एनएसए की बैठक में सुलह का रास्ता निकलने की अटकलों को भी खारिज किया गया है।


बता दें कि एक दिन पहले ही सोमवार को चीन ने संकेत दिए थे कि ब्रिक्स बैठक के अलावा डोभाल और चीनी समकक्ष अलग से मीटिंग कर सकते हैं। चीनी विदेश मंत्रालय में प्रवक्ता ने कहा था, ‘जहां तक हमारी जानकारी है, पिछली बैठकों में मेजबान देश प्रतिनिधिमंडलों के प्रमुखों की द्विपक्षीय बातचीत के लिए इंतजाम करता रहा है, जिसमें वे द्विपक्षीय संबंधों, ब्रिक्स में सहयोग आदि पर चर्चा करते हैं।’ उन्होंने कहा था कि राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग के मसलों पर चर्चा के लिए ब्रिक्स मीटिंग मुख्य मंच है। हालांकि, नए लेख के बाद सिक्किम सीमा के नजदीक आमने-सामने खड़ी दोनों देशों के सेनाओं के बीच तनाव कम होने की उम्मीदों को झटका लगा है।

आर्टिकल में लिखा है कि अजीत डोभाल के चीन दौरे को लेकर भारतीय मीडिया उम्मीदें लगाए बैठा है कि इससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच जारी गतिरोध का हल निकल सकता है। इसमें आगे लिखा है, ‘चीन इस बात पर कायम है कि दोनों पक्षों के बीच किसी भी अर्थपूर्ण बातचीत के लिए भारत का इस इलाके से सेना हटाना पहली शर्त है। चीनी पक्ष तब तक भारत से कोई बात नहीं करेगा, जब तक उनकी सेना बिना किसी शर्त चीनी क्षेत्र से हट नहीं जाती। भारत को अपना भ्रम दूर कर लेना चाहिए। निश्चित तौर पर डोभाल का चीन दौरा भारत के मनमुताबिक इस टकराव को खत्म करने का मौका नहीं है।’




आगे लिखा है, ‘ब्रिक्स के नैशनल सिक्यॉरिटी अडवाइजर्स की मीटिंग ब्रिक्स समिट की तैयारियों की दिशा में होने वाला रूटीन कार्यक्रम है। यह चीन और भारत के बीच सीमा पर होने वाली झड़प को दूर करने का मंच नहीं है। अगर डोभाल सीमा विवादों को लेकर चीन के साथ मोलभाव करते हैं तो वह निश्चित तौर पर निराश होंगे। बिना किसी शर्त भारतीय सेना का हटना चीन की पहली मांग है। भारतीय सेना के पीछे हटने से जुड़ी चीनी सरकार की मांग के पीछे सभी चीनी नागरिक भी खड़े हैं। नागरिक इस बात पर अडिग हैं कि एक इंच चीनी क्षेत्र गंवाया नहीं जा सकता।’
लेख में भारतीय मीडिया को निशाने पर लेते हुए कहा गया है, ‘इंडियन मीडिया अपनी सेनाओं के पीछे हटने के सम्मानजनक तरीके ढूंढ रहा है। हमारा विश्वास है कि अगर भारत अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानता है तो सेनाओं को पीछे करने से उसकी शराफत जाहिर होगी। चीन को अपनी सेनाएं हटाने या सड़क निर्माण टालने के मामले में भारत के साथ सहयोग करने में कोई आपत्ति नहीं है। भारत ने सिक्किम सेक्टर में जबरन सीमा पारकर घुस आकर गलत किया है और उसे अपनी गलतियां सुधारनी चाहिए।’
भारत को एक बार फिर चुनौती

आर्टिकल में लिखा है, ‘भारत को अपने भ्रम दूर कर लेने चाहिए। पीपल्स लिब्रेशन आर्मी सीमाई इलाके में तैनात की जा रही है। अगर भारत पहल करते हुए खुद से सेना नहीं हटाता तो चीनी सेना जवाबी कार्रवाई कर सकती है। पीएलए के पास ऐसे ऐक्शन लेने की क्षमता है, जो न भारतीय सेना और न ही वहां की सरकार झेल पाएगी। हमें भरोसा नहीं है कि भारत चीन के साथ आमने-सामने का सैन्य टकराव लेने का इच्छुक है। अगर वह यह रास्ता चुनता है तो चीन अपने क्षेत्र की हिफाजत के लिए आखिर तक लड़ेगा।…भारत को महंगी कीमत चुकानी होगी। भारत के खुद से सेना हटाने से उसे कम से कम नुकसान होगा। अगर चीन ने जवाबी कार्रवाई की तो भारत ज्यादा मुश्किल राजनीतिक और सैन्य हालात में घिर जाएगा। उसे 1962 के बाद अब तक के सबसे बड़े सामरिक झटके का सामना करना होगा।’ आखिर में लिखा है, ‘चीनी की जीडीपी भारत के मुकाबले पांच गुनी जबकि रक्षा बजट चार गुना ज्यादा है। हालांकि, सिर्फ यही हमारी ताकत का स्रोत नहीं है। न्याय चीन के पक्ष में है। भारत की ओर से सेना को पीछे हटाने को लेकर चीन न केवल सही है, बल्कि उसका यह रुख अटल भी है।’

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