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जीवन के उलझन

जीवन के उलझन

साहित्य
  उलझन एक अजीब है , जब उलझे संसार | प्रेम में उलझन , बनती बात , प्रेम  उलझकर बना ओ प्यार , इतना सुन्दर ये संसार || प्रेम रूपी जब दीप जला तो , खुशियों से खिलता संसार | खुशिया बहुत निराली है , जब  उलझन बनता प्यार ही प्यार || जब उलझन होता झगड़ो का , तब दुनिया बनती खड़हर सा | इश दुनियाँ (परिवार) में दीप न जलता , तो लगता है आया काल | काल रूपी जब दीप जला तो , खुशियाँ बनती है जौजाल || जब खुशियाँ उठती है ऊपर , तो आते है काल का छाँव | इश छाँव में जल जाते है , ऊपर -ऊपर के ही पाँव || तो लगे कबारन(उजागर)  उन मुर्दो(बात)  को , जो खुशिओं से दबे पड़े थे | जब कबरन को मुर्दे लागे, तो लागे संसार की दुरी भागे | छांट - छूँट कर , बाट बूट कर , अलगा हुवा यही संसार |- 2 | एक ही खून के दो जन्मे थे , लेकिन बात नहीं बनते थे | एक लगा कुछ बोलन लागे , दूसरा बोलन जोर से लागे || इशी बीच में हो गई